अलविदा

ताज़ी बर्फ़ होता है वक़्त
कोई निशाँ जमने नहीं देती
तजुर्बे नए फाहों से
ढकते रहते हैं
क़दमों से बने रास्ते

तुम बर्फ़ की तरह याद आते हो
ख़ूबसूरत , पुरसुकून
पूरी साल इंतज़ार करने पर
मिलने वाली नेमत
लेकिन सर्द , मुश्किल

पिघल कर
अपने घर लौटने की
जल्दी लिए
मेरे हिस्से में गिनती के लम्हों को गिनते तुम
मेरे साथ जितने भी थे उसी के तुम

वो जहाँ जिस्म ने मुड़ कर
रूह को देखा था
किसी नक़्शे पे
लाल सियाही से
मैंने वहां फ़ना लिखा !