बुरा सपना…..

कभी-कभी कई -कई दिन निकल जाते हैं, बुरा सपना एक उम्र जितना लम्बा भी हो सकता है न? जागने की घड़ियों में भी , स्क्रीन से, किताबों से , उमस बन झड़ते हैं बीते हुए दिनों के प्रेत झरते रहते हैं। कोई उम्मीद जगती है किसी तारिख से और फिर जैसा की होता आया है होता है, कुछ नहीं बदलता। दर्द मापने के स्केल बना लिए हैं दुनिया ने सुना है लेकिन कोई सुन ले आवाज़ में दर्द तो समझो वॉइस मॉडुलेशन जो सीखी थी वो भी अब बेकार हो चली है।

यादें और तेज़ी से मिटने लगी हैं अपना स्लेट, जैसे पहाड़ी बच्चे व्याकुल रहते हैं छुट्टी की घंटी तक कि ज्यूँ ही बजे बिन दीवार के स्कूल की बंदिश लांघकर बह जाएँ वादी में। मोहब्बत सुखी बावड़ी सी, अधूरी बातों की हरी काई सहेजती, यादें अब न ही लौटें तो अच्छा….. दोहरानी न पड़े कोई मुश्किल अलविदा।

मैं जीवन से कहती हूँ गले लगा ले, उसे विश्वास नहीं बहुत बीमार हूँ मैं …..

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