दुनियादारी

अख़रोट की लकड़ी की
ऊँची दराज़दार अलमारी
श्रीनगर डाउनटाउन से
दो मोढ़े बिन मोल-भाव के
जयपुर हाईवे से
बर्लिन की गिरी हुई दीवार का
एक टुकड़ा
इस्तानबुल से लिए कैफियह
कितनी ही किताबें अब भी दो-दो हैं

फ़ेहरिस्त सामान की
बनानी पड़ेगी न ?

और ये जो आँखों के काले घेरे हैं
वक़्त से पहले सफ़ेद हुए तुम्हारे-मेरे बाल
सीने के बीचोंबीच एक ब्लैक होल
ऊपर से नहीं दिखती
एक रसौली है कहीं रीढ़ में

मीठा अब थोड़ा फ़ीका है
सफ़ेद ग्रे होते-होते
धुंधला काला हो चुका है
फरवरी इस बार दिसंबर है
किसी कैंसर वाले फेफड़े का एक्स-रे देखना
धीरे-धीरे अपने ही खून में डूबती सांस

मछली की आँख में गड़ा कांटा
हर बार खींचने पर
मरता होगा एक सपना?

फ़ेरहिस्त लिखने बैठी थी…..
मुश्किल है ये हिसाब-किताब
तुम गिन लो
बाँट भी दो
फ़कीर रूह से अब
तुम्हारी दुनियादारी नहीं निभती

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