इक कुड़ी ….

इक कुड़ी
पारदर्शी होती गयी
और तुम देखते रहे
उन्हीं पुरानी आँखों से
नाभी तक ही
थोड़ा ऊपर
थोड़ा नीचे

न उसका दिल
न उसकी रूह
न उसकी नब्ज़ थमी
तुम देखते रहे
कुछ और ही कहीं

अब वो
एक शीशा है
पूरी पारदर्शी
अब वो
तुम्हारे देखने के
दायरे में है ही नहीं

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2 विचार “इक कुड़ी ….&rdquo पर;

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