रिक्त स्थान

और फिर एक दिन अचानक उसे एहसास होता है कि जिस बात का उसे सबसे ज़्यादा डर था वही बात हो गयी है।

उसके लाख न चाहने पर भी वो सिंगल पैरेंट है इसलिए घर की “मुखिया” हो गयी है और उससे अपेक्षाएं वैसी ही हैं जैसी होती थीं किसी पिता से।

तमाम जिम्मेदारियां उसकी हो गयी हैं जो होती थीं किसी बेटे की, और दिक्कत ये नहीं बल्कि ये है कि चाहा जाता है वो निभाए उन्हें बेटे की ही तरह ,अपनी तरह नहीं।

हर सफर में गाड़ी में अगली सीटें अब उसकी हैं, क्योंकि अब वो बड़ा भाई बना दी गयी है, वो कभी भी बहन बनकर या इंसान बनकर भी नहीं कह सकती की सीट बेल्ट बाँध कर सीधे बैठे-बैठे दुखते हैं उसके कंधे या कि किसी रात के सफर में जब सब सोए हैं, उसे भी आती है झपकी।

घर लौट कर फिर बना दिया जाता है उसे बेटी, बड़ी बहन, माँ – आखिर बातें फिर लौट आईं है शादियों,ज़ेवरों, रात के खानों को तरफ और अब उसे उतारना है देहलीज़ के बाहर ही अपना सशक्तपन और ओढ़ना है फिर से घरेलू और पालन पोषण करने वाली का जिस्म।

मेरे जैसी औरतें इंसान नहीं होती वो बस रिक्त स्थान की पूर्ति होती हैं!

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मौत का साल…..2018

2018 में मैंने मरने की और एक रस्म भी पूरी की है, मरहूम के मुतालिक अपनी मौत का एलान खुद लिख दिया है , ताकि किसी बेवफा चाहने वाले को, किसी मजबूर दोस्त को या किसी बच्चे को ये काम भी न करना पड़े।

ये मौत का साल था,रिश्ते मरे,अजीज़ कई कह गए अलविदा, कुछ मरहूम हुए, कुछ बदल गए, अल्लाह उनकी उम्र लम्बी करे , आख़िर मुझसे शिकायतों के लिए वक़्त काफी चाहिए होगा।

मैंने देखा है क़रीब से बैठ कर , बस करीब २ घंटे में एक जिस्म था जिसे मैं वालिद समझती थी , आग के सुपुर्द हुआ और एक मुट्ठी राख बचा।

रिश्ते , मोहब्बत के वादे , तुम्हारा कोई दिन अब तन्हा न होगा के इरादे , वो जब जले तो मुट्ठी भर राख़ भी हाथ न आयी की बहा देती किसी नदी में और पूरी हो जाती रस्मे-दुनिया।

शायर ने क्या खूब लिखा है दोस्त बन-बन के मिले मुझ को मिटाने वाले, जिन्होंने इस बेरंग चॉक से बने स्केच जैसे दिल में रंग भरे , कच्चे रंग जो वक़्त की पहली आँधी में ही उड़ गए, स्केच का खांचा हमेशा के लिए बिगाड़ गए।

दिल एक दरार वाले मिट्टी के बर्तन सा, रिसती है उससे ज़िन्दगी , न टूटा है, न जुड़ा है। न पहले सा पूरा बचा, न टुकड़ा टुकड़ा बिखरा की दफ़नाया जा सके।

रूह खंडहर ,भरभरा के दरकने लगी है , लगता है अब का सर्द मौसम आख़िरी हो , जब ये जगह खाली हो जाए तो यहीं मिलना है उस किसी से जिस के लिए रूमी कह गए थे – तुम मिलना मुझे शहर से दूर उस खुले मैदान में…….

तब तक हम ख़ाक ख़ाक उड़ते हैं कसूर से इस्तांबुल तक, किसी के जर्मन गाँव के बर्फ हुई झील से दूर कहीं किसी हसरतों के समंदर के किनारे तक।

एक और साल के साथ कुछ और तमाम हम हुए !

साँस लेना कोई दलील नहीं
मैं नहीं मानता,ज़िन्दा हूँ मैं

#जौन_एलिया

तन्हाई

इस घुटन का सबब क्या है ? मेरे आसपास के सवालों का शोर या फिर मेरे अंदर का गहरा सन्नाटा। धुंध से ढकी सर्दियों की सुबहें, ठिठुरती शामें सब सुन्न हैं , लेकिन कम्बख़्त दर्द फिर भी महसूस होता है। वो जो गरम हाथ अब किसी और हाथ में है उसका छोड़ा हुआ ख़ालीपन लगभग हर हाथ में बरक़रार है। साँस आदतन आती है ,जाती है , मुस्कराती भी हूँ लेकिन आँखों के कोर जो तुम्हारे आख़िरी सितम की नमी से भीगे हैं वो उस शुष्क मौसम में भी नहीं सूखती।

आज़ादी तनहा होती है और कैद तनहा लेकिन ये दोनों तन्हाईयाँ एक सी नहीं होती, किसी के आने से पहले जो दर्द था और किसी के जाने के बाद जो दर्द होता है वो कभी एक नहीं होता।

मैं लौट आयी हूँ अपने रूह के कारागार में अपनी अकेली मौत के दिन गिनने के लिए ,वो स्कूल में सीखा था न दीवार पर लकीरें खींच कर गिनती करना , वो अब काम आएगा। तुम भेजोगे फूल मेरी कब्र पर ? शायद लिखो एक लम्बा शोक सन्देश भी , काश उससे पहले ज़रूरी लगे कभी तुम्हें मेरी आँखों में झांकना,काश कभी तुम देखो अपना सच वहाँ , शायद किसी आँसू में बह निकले मेरे लिए किसी पनाह का रास्ता।

अभी बस दर्द है तन्हाई है……….

रिहाई……

 

 

पहाड़ों में बीते बचपन को ढलानों पर भागना तो आता था पर यथार्थ के पथरीले समतल पर रुकना नहीं। पहाड़ों के कबूतर बर्फ़ समझते हैं , पहाड़ और देवदार भी , उन्हें ऊँची इमारतों के कोनों में घोंसले बनाने का हुनर नहीं आया।

काँच के चमकीले दिलों पर इश्क़ की चोंच से न निशाँ बने न रास्ते, जिन चीलों के पंखों के फ़ैलाव को समझा उन्होंने उनका बड़प्पन वो निकले उनके क़ातिल पंजों को छिपाने भर के इंतेज़ाम।

मासूम दिलों के लिए क्या -क्या छलावे हैं दुनिया में , कि होना ही भरम है यूँ तो , फिर इश्क़ की झूठी कसमें भी हैं और महबूब के सिर्फ मेरे होने के धोखे भी।

मौत सामने देखकर वो बंद कर लेते हैं आँखें और देखते हैं कांगड़ी पर सिकते हुए गुनगुने सपने, कि सब वैसा ही खूबसूरत होगा जैसा होता है कहानियों की किताबों में,शायरों के रिसालों में , मोहब्बत में डूबे दिलों के ख्यालों में।

और फिर कुछ नहीं बचता ,वक़्त एक बेरहम बिल्ली ,आख़िरी पंख तक नोच लेती है, हाड-माँस मरता है ऐसा कहते हैं और रूह , रूह भटकती है निजामुद्दीन के गुम्बद और बंगला साहेब के सरोवर के बीच, कहते हैं हज़ारों बार जब झूठ कहेगा वो कि उसने मुझसे मोहब्बत की थी और भूल कर कभी इक बार सच कहेगा तब मिलेगी रिहाई !

दिसम्बर से गुफ़्तगू

इन आँखों में
एक उजड़ा घर बसता है
इन होंठो पर रहती है
एक मरे हुए बच्चे के लिए लोरी

baby foot

दिसंबर से मेरा रिश्ता अजीब है , हर साल उसे लिखती हूँ एक बेरंग प्रेमपत्र , मिन्नतें करती हूँ- “अगले साल थोड़े कम क्रूर बन कर आना प्लीज़ !” , पर वो नहीं मानता ,कहता है- “बहुत हसरत थी न तुम्हें ज़िन्दगी से आँखें मिलाने की ,देखते हैं कब तक नहीं टूटोगी। हम वक़्त हैं तुम जैसी एक आम फ़कीर औरत से हारने लगे तो चल लिया हमारा कारोबार।”

“लिखो शायरी,तुम्हारे महबूब-ए-इलाही भी नहीं दे सकते हमारे दिए घावों के मरहम !”

अब आँसूँ बहने लगते हैं, रोने को कभी कमज़ोरी नहीं समझा मैंने, पर सबको दर्द दिखाना अब भी ठीक से नहीं आया, मैं कहती हूँ अच्छा ठीक है , मैं हारी, तुम जीते , अब और बर्दाश्त नहीं होता दर्द, जानती हूँ नहीं भरेंगे अबके ज़ख्म बहुत गहरे हैं, पर तुम इस ज़िन्दगी की क़ैद से निजात भी तो नहीं देते, सब कुछ तो ले लिया है तुम ने, जिन्हें रूह के ख्वाबों से संजोया वो ख्वाब, जिन्हे दिल के लहू से सींचा वो तम्मनाएँ।

2018 से रहम माँगा था, लेकिन सजा ही मिली , एक आखिरी मजाज़ी इश्क़ बचा था वो ले लिया अच्छा किया , लेकिन एक आखिरी हक़ीक़ी उम्मीद बची थी इस जिस्म में, इस रूह में ,वो अजन्मा बच्चा भी तुम ने छीन लिया, ये जो राख जिस्म है ये किस लिया बचाया है?

दिसंबर इतनी बेरुख़ी भी अच्छी नहीं, बस अब नहीं सही जाती बेरहमी तुम्हारी, अच्छा नहीं मांगती समंदर के किनारे वाली कब्र, किसी अनजान शहर की किसी सड़क पर ही सही इस जनम से अब तो दे दो रिहाई ,गुमशुदा ही सही अब सफ़र से तौबा हुई।

थोड़ा दर्द कम कर दो न…..

डियर ….

आज रूह के पुराने फ़ोल्डरों से हमारी तस्वीरें मिटाने की फिर से कोशिश में हूँ। तुम में मुड़ के किसी और के हो जाने का जो हुनर है ,मुझे भी सीखा दो न।
आज कल अनजान सड़कों पर गाड़ी चलाते हुए याद आता है तुम्हारा कहना – “तुम्हारा सेंस ऑफ़ डायरेक्शन इतना ख़राब है , तुम कभी पक्का गुम जाओगी !”

हाँ गुम चुकी हूँ सालों पहले, अब कोई सुराग नहीं बाकी, मेरी फाइल पर केस क्लोज़्ड कौन से पेन से लिखा है तुम ने?

पुरानी वाइन और बेहतर होती जाती है ,पुराना दर्द और पुख़्ता,पुराने ज़ख्म भर तो जाते हैं लेकिन निशाँ और टीस रह ही जाती है। वक़्त मरहम है कहते हैं सभी किसी को ये कभी क्यों न लगा की तारीखें ज़ुल्म हैं ? राइट टर्न पर दुखता है अंगूठे का वो बचपन वाला हेयरलाइन फ्रैक्चर और हर वो सर्द सुबह दुखती है जब तुम ने मेरे हाथ चूमे थे।

मेरे हाथ को अपने एक हाथ से थामे तुम ने ली थी तस्वीर उन हाथों की, अब वो बस एक तस्वीर में ही साथ बचे। तुम जब थामते हो उसी हाथ से किसी और का हाथ या किसी और तस्वीर के लिए फिर से तुम्हारी बाज़ू थामती है किसी और का कंधा, क्या तुम्हें कभी चुभा है मेरा वहां न होना ?

तुम्हारी हथेली की गर्मी में अब कोई नया दिल संभला हो तो भी, बीते वक़्त की लकीरें मिटी तो न होंगी ?

क्या तुम्हें याद हैं हमारे अजन्मे बच्चों के नाम ? वो दुनिया के तमाम शहर , गाँव, नदियां ,पहाड़ जहाँ हम घर बसना चाहते थे ,जहाँ से तिनका-तिनका जोड़ के तुम ने मुझ खानाबदोश को दिया था घोंसले का ख़्वाब?

समन्दरों से मोहब्बत करने वाली रूह को तुम उजाड़ रेगिस्तान में अकेला क़ैद कर गए हो, और बसा लिया है घर समंदर के पास ,याद है ? रियर व्यू मिरर हर बार मेरे आंसुओं से धुंधला जाता है, तुम नहीं मुड़ते …..

मैं कहती हूँ डॉक्टर से बढ़ा दे नींद की गोलियाँ , वो कहता है तुम

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गृहलक्ष्मी

Housewife

 

 

उद्यम से स्वादविहीन
आखिरी रोटी खाती है
उसकी रसोई के विश्लेषण
में कहे सब कड़वे शब्द
चिपके हैं तालू से

सुन्दर, महंगी साड़ी
उसने बचा रखी है
किसी विशेष अवसर के लिए
जब कि मर चुके हैं
उसके देह के सारे त्यौहार
तुम्हारे बिस्तर में

बच्चों की ख्वाहिशों
का हिसाब लगाती
मुल्तवी कर चुकी है
वो अपने सारे अल्हड़पन
तुम्हारे असम्वेदन को
रोज़ सींचती गूंगे आंसुओं से

तुम्हारी देवी, प्रिया
गृहलक्ष्मी