दुनियादारी

अख़रोट की लकड़ी की
ऊँची दराज़दार अलमारी
श्रीनगर डाउनटाउन से
दो मोढ़े बिन मोल-भाव के
जयपुर हाईवे से
बर्लिन की गिरी हुई दीवार का
एक टुकड़ा
इस्तानबुल से लिए कैफियह
कितनी ही किताबें अब भी दो-दो हैं

फ़ेहरिस्त सामान की
बनानी पड़ेगी न ?

और ये जो आँखों के काले घेरे हैं
वक़्त से पहले सफ़ेद हुए तुम्हारे-मेरे बाल
सीने के बीचोंबीच एक ब्लैक होल
ऊपर से नहीं दिखती
एक रसौली है कहीं रीढ़ में

मीठा अब थोड़ा फ़ीका है
सफ़ेद ग्रे होते-होते
धुंधला काला हो चुका है
फरवरी इस बार दिसंबर है
किसी कैंसर वाले फेफड़े का एक्स-रे देखना
धीरे-धीरे अपने ही खून में डूबती सांस

मछली की आँख में गड़ा कांटा
हर बार खींचने पर
मरता होगा एक सपना?

फ़ेरहिस्त लिखने बैठी थी…..
मुश्किल है ये हिसाब-किताब
तुम गिन लो
बाँट भी दो
फ़कीर रूह से अब
तुम्हारी दुनियादारी नहीं निभती

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होना ….

किसी का होना
बस होना भर ही
काफी होता है
हमें भरने के लिए

उस किसी का लौटना
सज़ा होता है
प्रवासी पक्षियों के डेरे
रहते हैं साल भर उदास

बसने और उजड़ने के
बीच कहीं
एक भूमध्य रेखा है
जो कांपती रहती है

उसके हाथ की नरमी से
पिघलने लगा था जो
दिल का उत्तरी ध्रुव
अब एक लुप्त ग्लेश्यिर है

वो जो चाहता है
मैं हो जाऊँ उसकी धूरी
नहीं जानता
मैं एक
टूटा हुआ उल्कापिंड हूँ

बहुत कम बची हूँ मैं !

“It’s not what people do to you, but what they mean, that hurts.” 
E.M. Forster, The Longest Journey

रूह के रोज़नामचे भी कोई कब तक लिखे, सारी बातें माया ही तो हैं जो मैंने कहा और जो तुम ने सुना वो एक कब हुआ, मैंने क़ब्र सा तय एक घर माँगा उसने सराय सा ये जिस्म बस एक पड़ाव समझा। हमसफ़र हो के भी हमनफ़स हो कोई ज़रूरी तो नहीं , जिसका जाना आने से पहले ही तय था उसके जाने पर जान न जाए ये कहाँ लिखा है?

रूह के परिंदे फड़फड़ाते हैं और डर जाते हैं दुनियादारी के गिद्धों से ,नामों वाले रिश्तों की अपनी सलीबें हैं। जिस्म बस पहला परदा है रूह के रास्ते का लेकिन इससे हो कर गुज़रना कब आसान हुआ। जहाँ कोई नया छूता है उभर आते हैं बीते हुए माज़ी के निशान, खोये हुए इश्क़ की गर्माहट आँखों से बह निकले इससे पहले कस कर भींच लेनी होती हैं पलकें।

मेरी पीठ पर एक नक्शा है मेरे जिस्म से उसके घर तक का और आगे की बंद गली का, जहाँ से हम बिछड़े वहां लौट के मिलने के कोई बहाने नहीं होते। हर रिश्ता एक क़र्ज़ है कुछ चुक गया है,कुछ न कटेगा ताउम्र।

मेरी सलीब पर जहाँ वक़्त के कील हथेलियों के पार हुए हैं उनसे कट गयी हैं नसीब की सारी लकीरें और इश्क़ तुम बहने लगे हो किसी कटी हुई नस से कतरा-कतरा,मत बचाना मुझे अब बहुत कम बची हूँ मैं !

रिक्त स्थान

और फिर एक दिन अचानक उसे एहसास होता है कि जिस बात का उसे सबसे ज़्यादा डर था वही बात हो गयी है।

उसके लाख न चाहने पर भी वो सिंगल पैरेंट है इसलिए घर की “मुखिया” हो गयी है और उससे अपेक्षाएं वैसी ही हैं जैसी होती थीं किसी पिता से।

तमाम जिम्मेदारियां उसकी हो गयी हैं जो होती थीं किसी बेटे की, और दिक्कत ये नहीं बल्कि ये है कि चाहा जाता है वो निभाए उन्हें बेटे की ही तरह ,अपनी तरह नहीं।

हर सफर में गाड़ी में अगली सीटें अब उसकी हैं, क्योंकि अब वो बड़ा भाई बना दी गयी है, वो कभी भी बहन बनकर या इंसान बनकर भी नहीं कह सकती की सीट बेल्ट बाँध कर सीधे बैठे-बैठे दुखते हैं उसके कंधे या कि किसी रात के सफर में जब सब सोए हैं, उसे भी आती है झपकी।

घर लौट कर फिर बना दिया जाता है उसे बेटी, बड़ी बहन, माँ – आखिर बातें फिर लौट आईं है शादियों,ज़ेवरों, रात के खानों को तरफ और अब उसे उतारना है देहलीज़ के बाहर ही अपना सशक्तपन और ओढ़ना है फिर से घरेलू और पालन पोषण करने वाली का जिस्म।

मेरे जैसी औरतें इंसान नहीं होती वो बस रिक्त स्थान की पूर्ति होती हैं!

मौत का साल…..2018

2018 में मैंने मरने की और एक रस्म भी पूरी की है, मरहूम के मुतालिक अपनी मौत का एलान खुद लिख दिया है , ताकि किसी बेवफा चाहने वाले को, किसी मजबूर दोस्त को या किसी बच्चे को ये काम भी न करना पड़े।

ये मौत का साल था,रिश्ते मरे,अजीज़ कई कह गए अलविदा, कुछ मरहूम हुए, कुछ बदल गए, अल्लाह उनकी उम्र लम्बी करे , आख़िर मुझसे शिकायतों के लिए वक़्त काफी चाहिए होगा।

मैंने देखा है क़रीब से बैठ कर , बस करीब २ घंटे में एक जिस्म था जिसे मैं वालिद समझती थी , आग के सुपुर्द हुआ और एक मुट्ठी राख बचा।

रिश्ते , मोहब्बत के वादे , तुम्हारा कोई दिन अब तन्हा न होगा के इरादे , वो जब जले तो मुट्ठी भर राख़ भी हाथ न आयी की बहा देती किसी नदी में और पूरी हो जाती रस्मे-दुनिया।

शायर ने क्या खूब लिखा है दोस्त बन-बन के मिले मुझ को मिटाने वाले, जिन्होंने इस बेरंग चॉक से बने स्केच जैसे दिल में रंग भरे , कच्चे रंग जो वक़्त की पहली आँधी में ही उड़ गए, स्केच का खांचा हमेशा के लिए बिगाड़ गए।

दिल एक दरार वाले मिट्टी के बर्तन सा, रिसती है उससे ज़िन्दगी , न टूटा है, न जुड़ा है। न पहले सा पूरा बचा, न टुकड़ा टुकड़ा बिखरा की दफ़नाया जा सके।

रूह खंडहर ,भरभरा के दरकने लगी है , लगता है अब का सर्द मौसम आख़िरी हो , जब ये जगह खाली हो जाए तो यहीं मिलना है उस किसी से जिस के लिए रूमी कह गए थे – तुम मिलना मुझे शहर से दूर उस खुले मैदान में…….

तब तक हम ख़ाक ख़ाक उड़ते हैं कसूर से इस्तांबुल तक, किसी के जर्मन गाँव के बर्फ हुई झील से दूर कहीं किसी हसरतों के समंदर के किनारे तक।

एक और साल के साथ कुछ और तमाम हम हुए !

साँस लेना कोई दलील नहीं
मैं नहीं मानता,ज़िन्दा हूँ मैं

#जौन_एलिया

तन्हाई

इस घुटन का सबब क्या है ? मेरे आसपास के सवालों का शोर या फिर मेरे अंदर का गहरा सन्नाटा। धुंध से ढकी सर्दियों की सुबहें, ठिठुरती शामें सब सुन्न हैं , लेकिन कम्बख़्त दर्द फिर भी महसूस होता है। वो जो गरम हाथ अब किसी और हाथ में है उसका छोड़ा हुआ ख़ालीपन लगभग हर हाथ में बरक़रार है। साँस आदतन आती है ,जाती है , मुस्कराती भी हूँ लेकिन आँखों के कोर जो तुम्हारे आख़िरी सितम की नमी से भीगे हैं वो उस शुष्क मौसम में भी नहीं सूखती।

आज़ादी तनहा होती है और कैद तनहा लेकिन ये दोनों तन्हाईयाँ एक सी नहीं होती, किसी के आने से पहले जो दर्द था और किसी के जाने के बाद जो दर्द होता है वो कभी एक नहीं होता।

मैं लौट आयी हूँ अपने रूह के कारागार में अपनी अकेली मौत के दिन गिनने के लिए ,वो स्कूल में सीखा था न दीवार पर लकीरें खींच कर गिनती करना , वो अब काम आएगा। तुम भेजोगे फूल मेरी कब्र पर ? शायद लिखो एक लम्बा शोक सन्देश भी , काश उससे पहले ज़रूरी लगे कभी तुम्हें मेरी आँखों में झांकना,काश कभी तुम देखो अपना सच वहाँ , शायद किसी आँसू में बह निकले मेरे लिए किसी पनाह का रास्ता।

अभी बस दर्द है तन्हाई है……….

रिहाई……

 

 

पहाड़ों में बीते बचपन को ढलानों पर भागना तो आता था पर यथार्थ के पथरीले समतल पर रुकना नहीं। पहाड़ों के कबूतर बर्फ़ समझते हैं , पहाड़ और देवदार भी , उन्हें ऊँची इमारतों के कोनों में घोंसले बनाने का हुनर नहीं आया।

काँच के चमकीले दिलों पर इश्क़ की चोंच से न निशाँ बने न रास्ते, जिन चीलों के पंखों के फ़ैलाव को समझा उन्होंने उनका बड़प्पन वो निकले उनके क़ातिल पंजों को छिपाने भर के इंतेज़ाम।

मासूम दिलों के लिए क्या -क्या छलावे हैं दुनिया में , कि होना ही भरम है यूँ तो , फिर इश्क़ की झूठी कसमें भी हैं और महबूब के सिर्फ मेरे होने के धोखे भी।

मौत सामने देखकर वो बंद कर लेते हैं आँखें और देखते हैं कांगड़ी पर सिकते हुए गुनगुने सपने, कि सब वैसा ही खूबसूरत होगा जैसा होता है कहानियों की किताबों में,शायरों के रिसालों में , मोहब्बत में डूबे दिलों के ख्यालों में।

और फिर कुछ नहीं बचता ,वक़्त एक बेरहम बिल्ली ,आख़िरी पंख तक नोच लेती है, हाड-माँस मरता है ऐसा कहते हैं और रूह , रूह भटकती है निजामुद्दीन के गुम्बद और बंगला साहेब के सरोवर के बीच, कहते हैं हज़ारों बार जब झूठ कहेगा वो कि उसने मुझसे मोहब्बत की थी और भूल कर कभी इक बार सच कहेगा तब मिलेगी रिहाई !