मक़बरा

दोनों कन्धों के बीचोंबीच
जहाँ मेरा हाथ नहीं पहुँचता
मैंने रख दी है तुम्हारी याद
शॉवर का पानी पड़ते ही
उसमें नील-लोहित के फूल
खिल उठते हैं

वहाँ जहाँ पानी की धार
घूम कर मेरे दिल के आस पास
घेरा बनाती है
वहाँ चमकती है तुम्हारी मुस्कान
तुम्हारे होठों के दस्तख़त
वहाँ नक़्क़ाशी में दर्ज हैं

मेरी हथेलियों से
उँगलियों के बीच
फूट पड़ते हैं हज़ारों झरने
जिन में तुम्हारी बातें, शरारतें घुली हैं
मेरी जाँघों के बीच
तुम्हारी लालसा का ताप है
हाँ अब भी!

मैं देखती हूँ रोज़
खुद को तरल होते हुए
और बहती हूँ उस मोड़ की ओर
जहाँ तुम जुदा हुए थे

दो पत्थर हैं जो नहीं पिघलते
एक छाती में धधकता लावा है
दूसरा बालों में
तुम्हारी उँगलियों के निशान वाला
चकमक पत्थर

लोग जिसे अस्थि पंजर समझते हैं
वो एक इश्क़ का मक़बरा है

Photo Of Woman Walking On Hallway